विद्युत विभाग के निजीकरण पर संकट: 77 हजार कर्मचारियों की नौकरी खतरे में, उपभोक्ताओं पर महंगी बिजली की मार

नगराम टाइम्स ब्यूरो /सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव

बाराबंकी। उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के प्रस्ताव ने राज्य के बिजली विभाग और उपभोक्ताओं के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है। यह प्रस्ताव अगर लागू हुआ, तो इससे 77,000 से अधिक कर्मचारियों की नौकरियां खत्म हो सकती हैं, और राज्य के डेढ़ करोड़ उपभोक्ताओं पर महंगी बिजली का बोझ पड़ सकता है।

उत्तर प्रदेश बिजली कर्मचारी संघ के संरक्षक रणधीर सिंह सुमन ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि यह कदम न केवल बिजली कर्मचारियों के भविष्य को अंधकारमय कर देगा, बल्कि आम नागरिकों के आर्थिक हालात को भी खराब करेगा। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह जनता और कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी कर निजी कंपनियों के फायदे के लिए काम कर रही है।

निजीकरण से होगा बड़े पैमाने पर नुकसान

रणधीर सिंह सुमन ने बताया कि यदि पूर्वांचल डिस्कॉम का निजीकरण हुआ, तो 27,000 संविदा कर्मी और 17,330 नियमित कर्मचारी प्रभावित होंगे। इसी प्रकार, दक्षिणांचल डिस्कॉम में 23,000 संविदा और 10,161 नियमित कर्मचारियों की नौकरी खतरे में है। निजीकरण के बाद संविदा कर्मचारियों को सीधे बाहर कर दिया जाएगा, जबकि नियमित कर्मचारियों को रिवर्ट किया जाएगा, जिससे उनकी सेवाएं समाप्त हो जाएंगी।

उन्होंने आगे कहा कि दक्षिणांचल के 8,582 कर्मचारी, जो पहले से ही डिस्कॉम में कार्यरत हैं, पावर कॉरपोरेशन में स्थानांतरित नहीं हो सकते। इनकी सेवाएं पूरी तरह निजी कंपनियों के हाथ में होंगी, जो कर्मचारियों को अपने हिसाब से नियुक्त या निकाल सकती हैं।

कर्मचारियों के अधिकार और सुविधाएं खत्म होंगी

निजीकरण के बाद कर्मचारियों को मिलने वाली कई अहम सुविधाएं समाप्त हो जाएंगी। इनमें रियायती दर पर बिजली, मेडिकल रीइंबर्समेंट, और मृतक आश्रितों को नौकरी देने जैसी योजनाएं शामिल हैं। यह स्थिति उन कर्मचारियों के लिए और भी गंभीर हो जाएगी, जो खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हैं। दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में उनके परिवारों को कोई सहायता नहीं मिलेगी।

महंगी होगी बिजली, बढ़ेगा आर्थिक बोझ

निजीकरण के बाद बिजली की दरें मौजूदा दरों की तुलना में कई गुना बढ़ सकती हैं। उदाहरण के लिए, जहां उत्तर प्रदेश में 0-100 यूनिट की बिजली 3.35 रुपये प्रति यूनिट है, वहीं मुंबई में यह 5.33 रुपये प्रति यूनिट है। इसी प्रकार, 501 यूनिट से अधिक की खपत पर उत्तर प्रदेश में वर्तमान में 7.50 रुपये प्रति यूनिट वसूला जाता है, जबकि मुंबई में यह दर 15.71 रुपये प्रति यूनिट है।

रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि निजी कंपनियां केवल मुनाफे पर ध्यान देंगी, जिससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। उन्होंने आशंका जताई कि यह स्थिति आम जनता, किसानों और छोटे व्यवसायियों के लिए असहनीय हो जाएगी।

बिजली कर्मचारी संघ करेगा आंदोलन

इस संकट को देखते हुए बिजली कर्मचारी संघ ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर बड़े आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है। रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि यह सरकार गरीबों और मध्यम वर्ग के रोजगार और सुविधाओं को छीनने पर उतारू है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन के माध्यम से सत्तारूढ़ दल के दलालों और निजीकरण के लाभार्थियों को बेनकाब किया जाएगा।

इस प्रेस वार्ता में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद सदस्य परवीन कुमार, जिला सचिव बृजमोहन वर्मा, कोषाध्यक्ष शिवदर्शन वर्मा, किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह, और कई अन्य संगठनों के नेता भी मौजूद थे। सभी ने निजीकरण के इस कदम की कड़ी आलोचना की।

क्या है सरकार की मंशा?

निजीकरण के इस प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए संघ ने कहा कि यह सरकार की नीतियां आम जनता के खिलाफ हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि सरकार क्यों मुनाफा कमाने वाले सार्वजनिक उपक्रमों को निजी कंपनियों को सौंपने पर आमादा है।

जनता पर क्या पड़ेगा प्रभाव?

बिजली विभाग का निजीकरण न केवल कर्मचारियों को बेरोजगार करेगा, बल्कि इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। महंगी बिजली दरें ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों और छोटे व्यापारियों के लिए भारी नुकसान का कारण बनेंगी।

संघ ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस प्रस्ताव को वापस नहीं लिया, तो राज्य भर में बड़े पैमाने पर आंदोलन होगा। इस दौरान धरने-प्रदर्शन और बिजली की आपूर्ति बाधित होने की भी संभावना है।

निजीकरण को रोकने की मांग

बिजली कर्मचारी संघ और अन्य संगठनों ने सरकार से मांग की है कि वह इस प्रस्ताव को तत्काल वापस ले और बिजली विभाग को सार्वजनिक उपक्रम के रूप में संचालित रहने दे। संघ का मानना है कि जनता और कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए यह जरूरी है।

इस प्रस्ताव से जहां एक ओर हजारों कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे, वहीं दूसरी ओर महंगी बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर भारी पड़ेगी। यह मुद्दा अब राज्य स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के लिए एक बड़ा संघर्ष बन चुका है। सभी की नजरें अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

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