बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर सांप्रदायिक हमले: भारत-पाक-बांग्लादेश महासंघ ने की हिंसा रोकने और लियाकत-नेहरू समझौते पर अमल की मांग

नगराम टाइम्स ब्यूरो /लखनऊ
‘भारत-पाक-बांग्लादेश बनाओ महासंघ’ ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिंदुओं के खिलाफ हो रही सांप्रदायिक हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की है। महासंघ के संयोजक और वरिष्ठ समाजवादी विचारक राजनाथ शर्मा, पूर्व विधायक सरवर अली, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता अमीर हैदर, लेखक शाहनवाज़ क़ादरी, और वरिष्ठ पत्रकार धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने संयुक्त बयान जारी करते हुए इस हिंसा को तत्काल रोकने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।

नेताओं ने कहा कि इस समस्या का स्थायी समाधान 1950 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच हुए समझौते (लियाकत-नेहरू पैक्ट) के प्रभावी क्रियान्वयन में है। इस समझौते में दोनों देशों ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी दी थी, लेकिन तीनों देशों की सरकारों ने आज तक इस पर पूरी तरह से अमल नहीं किया है।


लियाकत-नेहरू पैक्ट का महत्व

1950 में किए गए इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों में शांति और सौहार्द कायम करना था। इसके तहत शरणार्थियों को वापस लौटने और अपनी संपत्ति का निपटान करने, अपहृत महिलाओं और लूटी गई संपत्ति को लौटाने, जबरन धर्मांतरण को अमान्य घोषित करने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का संकल्प लिया गया था।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले

हाल ही में बांग्लादेश सरकार ने स्वीकार किया है कि अगस्त 2024 से अब तक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं, पर सांप्रदायिक हिंसा की 88 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन हमलों के संबंध में 70 गिरफ्तारियां भी हुई हैं। बांग्लादेश की 17 करोड़ की आबादी में करीब 1.5 करोड़ हिंदू, 10 लाख बौद्ध, और 5 लाख ईसाई शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र और अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा

महासंघ के नेताओं ने यह भी याद दिलाया कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित 150 से अधिक देशों ने 1992 में संयुक्त राष्ट्र के अल्पसंख्यक अधिकार घोषणा पत्र पर सहमति जताई थी। इस घोषणा पत्र में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को बढ़ावा देने का वादा किया गया था।

महासंघ का आह्वान

महासंघ ने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की सरकारों से लियाकत-नेहरू समझौते और संयुक्त राष्ट्र की प्रतिज्ञाओं का सख्ती से पालन करने की अपील की है। साथ ही, उन्होंने कहा कि यदि इन देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो शांति और सौहार्द का सपना कभी साकार नहीं हो सकेगा।

डॉ. राममनोहर लोहिया का सपना और महासंघ की विरासत

महासंघ के अध्यक्ष राजनाथ शर्मा ने डॉ. राममनोहर लोहिया के भारत-पाक एका के सपने को याद करते हुए कहा कि यह आंदोलन 1965 में बाराबंकी से शुरू हुआ था। तब से लेकर अब तक महासंघ ने तीनों देशों के बीच एकता और सहयोग बढ़ाने का संदेश दिया है। डॉ. लोहिया के शब्दों में, “राजनीतिक कारणों से हुआ यह विभाजन कृत्रिम है, और देर-सवेर यह देश फिर से एक होंगे। जब तक यह संभव नहीं होता, तब तक इन देशों का महासंघ बनाना चाहिए ताकि गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर संसाधनों का सही उपयोग किया जा सके।”

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